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सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता शुभम अवस्थी की याचिका पर उत्तराखंड में हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं को लेकर केंद्र, डीजीसीए, उत्तराखंड सरकार व अन्य से मांगा जवाब

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  • रिपोर्ट : अनुराग श्रीवास्तव – विशेष संवाददाता

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड में बार-बार होने वाली हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं के मुद्दे पर दायर एक याचिका पर गुरुवार को सुनवाई की। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने केंद्र सरकार, नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए), उत्तराखंड सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया। याचिका सुप्रीम कोर्ट के तेज-तर्रार युवा अधिवक्ता शुभम अवस्थी द्वारा दायर की गई, जो देशहित से जुड़े मामलों में अपनी सक्रिय वकालत के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने इस दौरान कहा कि इस याचिका को दायर करने में हमारा उद्देश्य है कि तीर्थयात्रियों एवं नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि हो और पवित्र घाटियों के आकाश में कोई भी जीवन अनावश्यक रूप से न खोए।


हालिया हादसा और चिंताएं : याचिका में केदारनाथ मार्ग पर हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई गई। विशेष रूप से 15 जून 2025 को केदारनाथ मंदिर से तीर्थयात्रियों को ले जा रहे एक हेलीकॉप्टर के गौरीकुंड के जंगलों में खराब दृश्यता के कारण दुर्घटनाग्रस्त होने की घटना का उल्लेख किया गया। इस हादसे में दो वर्षीय बच्चे और पायलट सहित सात लोगों की मौत हो गई थी। यह 30 अप्रैल को शुरू हुई चारधाम यात्रा के दौरान इस मार्ग पर पांचवां हेलीकॉप्टर हादसा था।


याचिका की प्रमुख मांगें : अधिवक्ता शुभम अवस्थी ने तर्क दिया कि पर्वतीय क्षेत्रों में हेलीकॉप्टर संचालन में सुरक्षा ऑडिट की कमी, पर्वत-विशिष्ट उड़ान प्रोटोकॉल का अभाव और जवाबदेही तंत्र की अनुपस्थिति नियामक व्यवस्था को अपर्याप्त बनाती है। याचिका में अंतरराष्ट्रीय नागर विमानन संगठन (आईसीएओ) के अनुलग्नक 19, परिपत्र 301 और दस्तावेज़ 9859 के तहत सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करने की मांग की गई।

याचिका में केदारनाथ जैसे व्यस्त हेलीपैडों पर बुनियादी ढांचे की कमियों, जैसे अग्निशमन उपकरण, प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मचारी और त्वरित प्रतिक्रिया इकाइयों की अनुपस्थिति को रेखांकित किया गया। साथ ही, विमान नियम, 1937 और डीजीसीए की आवश्यकताओं के बार-बार उल्लंघन के बावजूद कमजोर प्रवर्तन पर सवाल उठाए गए।



याचिका में निम्नलिखित मांगें शामिल हैं

– पर्वतीय क्षेत्रों में हेलीकॉप्टर संचालन के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार और लागू करना।

– सुरक्षा मानदंडों का उल्लंघन करने वाले ऑपरेटरों के नाम सार्वजनिक करना और गैर-अनुपालन की स्थिति में परमिट निलंबित या रद्द करना।

– ऑपरेटरों को मासिक ऑडिट सारांश, मौसम अस्वीकृति लॉग, पायलट पुन: प्रमाणन डेटा और पेलोड अनुपालन रिपोर्ट सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड करना अनिवार्य करना।

– राज्यों को उड़ानों की निगरानी के लिए केंद्रीकृत कमांड-एंड-कंट्रोल केंद्र स्थापित करने का निर्देश।

– उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्रों में एकल-इंजन हेलीकॉप्टर संचालन को सुरक्षा उपाय लागू होने तक निलंबित करना।

– सुधारों के लागू होने तक तिमाही अनुपालन रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल करना।


अधिवक्ता शुभम अवस्थी की भूमिका : अधिवक्ता शुभम अवस्थी ने इस याचिका के माध्यम से हेलीकॉप्टर संचालन में सुरक्षा मानकों की आवश्यकता को रेखांकित किया। ऐसे में उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य है कि तीर्थयात्रियों एवं नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि हो और पवित्र घाटियों के आकाश में कोई भी जीवन अनावश्यक रूप से न खोए। उनकी दलीलें न केवल नियामक कमियों को उजागर करती हैं, बल्कि तीर्थयात्रियों और यात्रियों की सुरक्षा के लिए तत्काल सुधारों की मांग को भी मजबूती प्रदान करती हैं।


मामले की अगली सुनवाई : सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की है। केंद्र, डीजीसीए और उत्तराखंड सरकार को याचिका में उठाए गए मुद्दों पर जवाब दाखिल करना होगा। यह मामला उत्तराखंड और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में हेलीकॉप्टर संचालन की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


 

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