फिल्म: हनुमान अंश
निर्देशक: विशाल चतुर्वेदी
कलाकार: शोभिनाव सत्य, विहान एस. हेगड़े, चंदन आनंद, पूर्णिमा तिवारी, अनिल के. रस्तोगी, गुलशन पांडे
शैली: आध्यात्मिक ड्रामा/बायोग्राफिकल
रेटिंग: ⭐⭐⭐½/5
नई दिल्ली। आज जब बड़े पर्दे पर भगवान और आध्यात्मिक कहानियों का मतलब अक्सर भव्य सेट, जबरदस्त VFX और बड़े बजट से जोड़कर देखा जाता है, ऐसे समय में ‘हनुमान अंश’ बिल्कुल अलग रास्ता चुनती है। फिल्म शोर नहीं करती, चमत्कारों का तमाशा खड़ा नहीं करती, बल्कि नीम करोली बाबा के जीवन और उनकी शिक्षाओं को एक मानवीय नजरिए से सामने रखती है। फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह सिर्फ बाबा की कहानी सुनाने की कोशिश नहीं करती, बल्कि उनके जरिए भक्ति, सेवा, प्रेम, त्याग और इंसानियत का अर्थ समझाने की कोशिश करती है।
कहानी में भगवान हनुमान हैं या नीम करोली बाबा?
फिल्म के नाम से पहली नजर में लगता है कि कहानी भगवान हनुमान के इर्द-गिर्द होगी। लेकिन पर्दे पर पहुंचने के बाद कहानी का केंद्र नीम करोली बाबा बन जाते हैं। यही फिल्म का दिलचस्प पहलू है। बाबा की हनुमान भक्ति और उनके जीवन से जुड़े प्रसंगों के जरिए फिल्म धीरे-धीरे यह सवाल सामने रखती है कि ईश्वर की भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित है या फिर उसका असली अर्थ इंसान के प्रति हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। फिल्म इस सवाल का जवाब उपदेश के बजाय कहानी और भावनाओं के जरिए देने की कोशिश करती है।
सादगी ही फिल्म की सबसे बड़ी ताकत
‘हनुमान अंश’ की कहानी में दिखावे की जगह सादगी है। फिल्म का प्रभाव बड़े एक्शन या चमत्कारी दृश्यों से नहीं, बल्कि किरदारों की भावनाओं से पैदा होता है। नीम करोली बाबा की भूमिका में शोभिनाव सत्य का अभिनय फिल्म को संभालता है। उनके किरदार में आक्रामकता या बनावटीपन के बजाय ठहराव दिखाई देता है। यही ठहराव फिल्म के आध्यात्मिक माहौल को मजबूत करता है। सहायक कलाकारों ने भी कहानी के भावनात्मक हिस्सों को प्रभावी बनाने में योगदान दिया है।
जहां फिल्म दिल जीतती है
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष उसका भावनात्मक असर है। कई दृश्यों में कहानी दर्शक को रोककर सोचने पर मजबूर करती है। भक्ति को सिर्फ धार्मिक भावना के रूप में नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और सेवा से जोड़ना फिल्म का सकारात्मक पक्ष है। संगीत भी फिल्म के आध्यात्मिक माहौल को बनाए रखने में मदद करता है। खासतौर पर भजनों और भावपूर्ण संगीत का इस्तेमाल कहानी के मूड के साथ चलता है। फिल्म का ‘मैंने तेरे ही भरोसे’ भजन भी दर्शकों के बीच खासा लोकप्रिय हुआ है।
कमजोरी कहां है?
फिल्म की यही सादगी कुछ दर्शकों के लिए इसकी कमजोरी भी बन सकती है। जिन लोगों को तेज रफ्तार कहानी, लगातार ट्विस्ट या बड़े पर्दे वाला भव्य सिनेमाई अनुभव पसंद है, उन्हें कुछ हिस्से धीमे लग सकते हैं। फिल्म का फोकस मनोरंजन से ज्यादा भाव और आध्यात्मिक अनुभव पर है। लेकिन अगर आप कहानी को धैर्य से देखते हैं तो फिल्म का असर धीरे-धीरे बढ़ता है। यही वजह है कि इसे लेकर दर्शकों की प्रतिक्रिया शुरुआत के मुकाबले समय के साथ मजबूत होती दिखाई दी है।
फैसला: भक्ति से ज्यादा इंसानियत की फिल्म
‘हनुमान अंश’ हर दर्शक के लिए नहीं है। अगर आप मसाला, एक्शन और VFX से भरी फिल्म की तलाश में हैं तो यह आपको धीमी लग सकती है। लेकिन अगर आपको आस्था, आध्यात्म, संतों की जीवन-यात्रा और भावनात्मक कहानियां पसंद हैं, तो यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी। सबसे खास बात यह है कि फिल्म देखने के बाद सवाल सिर्फ यह नहीं रहता कि नीम करोली बाबा कौन थे, बल्कि यह भी सामने आता है कि हम अपनी आस्था को अपने व्यवहार और जीवन में कितना उतार पाते हैं। यही ‘हनुमान अंश’ की असली ताकत है यह पर्दे पर भगवान को खोजने से ज्यादा, अपने भीतर इंसान को खोजने की कोशिश करती है।



