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KANPUR NEWS – राजनीति में पद और जिम्मेदारियां भले ही इंसान की दिनचर्या बदल दें, लेकिन पुराने रिश्तों की अहमियत अगर बरकरार रहे तो वही पल खास बन जाता है। कानपुर में ऐसा ही एक दृश्य देखने को मिला, जब तिरंगा यात्रा में शामिल होने पहुंचे उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक लौटते वक्त सड़क किनारे नारियल का ठेला लगाए अपने पुराने साथी और कार्यकर्ता रमाकांत तिवारी को देखकर अचानक रुक गए। डिप्टी सीएम ने अपना काफिला रुकवाया और सुरक्षा व प्रोटोकॉल की औपचारिकताओं से इतर सीधे अपने पुराने साथी के पास जा पहुंचे।
यह पूरा घटनाक्रम कानपुर दक्षिण के रतनलाल नगर क्षेत्र का बताया जा रहा है। बृजेश पाठक यहां तिरंगा यात्रा में शामिल होने पहुंचे थे। निर्धारित कार्यक्रमों में शामिल होने के बाद जब उनका काफिला वापस लौट रहा था, उसी दौरान सड़क किनारे नारियल बेचते रमाकांत तिवारी पर उनकी नजर पड़ी। पहचान होते ही उन्होंने काफिला रुकवा दिया। इस दौरान उनके साथ कानपुर दक्षिण के जिलाध्यक्ष शिवराम सिंह भी नजर आए।
रमाकांत तिवारी को देखकर बृजेश पाठक उनके पास पहुंचे और कुछ देर वहीं रुककर बातचीत की। उन्होंने पुराने साथी का हालचाल जाना और नारियल पानी भी पिया। मुलाकात का सबसे आत्मीय हिस्सा उस वक्त सामने आया, जब बृजेश पाठक की नजर रमाकांत के हाथ पर पड़े घाव पर गई। उन्होंने चोट के बारे में पूछा। रमाकांत ने बताया कि नारियल छीलते वक्त हाथ में चोट लगी है।
इस पर डिप्टी सीएम ने चिंता जताते हुए टिटनेस का इंजेक्शन लगवाने के बारे में पूछा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर इंजेक्शन नहीं लगवाया है तो किसी को भेजकर लगवा दिया जाए। बातचीत के यह अंश उस मुलाकात को महज औपचारिक अभिवादन से आगे ले जाते दिखाई दिए। सत्ता और पद की चमक से दूर यहां दो पुराने साथियों के बीच वही सहजता नजर आई, जो किसी पुराने रिश्ते में दिखाई देती है।
रमाकांत तिवारी को लेकर बताया जाता है कि वह बृजेश पाठक के शुरुआती राजनीतिक दौर में उनके साथ रहे हैं। समय के साथ बृजेश पाठक की राजनीतिक जिम्मेदारियां बढ़ती गईं और वह प्रदेश सरकार में उपमुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे, जबकि रमाकांत आज भी अपने काम से जुड़े हुए हैं। ऐसे में सड़क किनारे नारियल के ठेले पर हुई यह मुलाकात पुराने रिश्ते की निरंतरता का एक अलग ही संदेश देती नजर आई।
मुलाकात का अंतिम दृश्य भी खास रहा। विदा होने से पहले बृजेश पाठक ने रमाकांत तिवारी को सम्मान स्वरूप भगवा रंग का अंगवस्त्र पहनाया। इसके बाद उन्होंने अपने मित्र से कहा कि कभी भी किसी तरह की परेशानी हो तो बिना संकोच उनके पास जरूर आना। कुछ शब्दों की यह बातचीत वर्षों पुराने भरोसे और अपनत्व की कहानी कहती नजर आई।
इस पूरे घटनाक्रम की तस्वीर और वीडियो सामने आने के बाद लोग इसे अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं। किसी के लिए यह सादगी का उदाहरण है तो किसी के लिए पुराने साथियों को याद रखने और रिश्तों को सम्मान देने की तस्वीर। राजनीतिक चश्मे से अलग हटकर देखें तो इस मुलाकात का सबसे बड़ा संदेश यही है कि पद चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, पुराने रिश्तों के सामने इंसान का अपनापन ही उसकी असली पहचान बनता है।
कानपुर की सड़क पर नारियल के एक छोटे से ठेले के पास कुछ देर के लिए रुका यह काफिला इसलिए भी यादगार बन गया, क्योंकि यहां मुलाकात किसी मंच पर नहीं, बल्कि आम जिंदगी के बीच हुई। यही वजह है कि इस दृश्य को लोग कृष्ण-सुदामा जैसे उस भाव से जोड़कर देख रहे हैं, जहां रिश्ते हैसियत नहीं, अपनापन पहचानते हैं।
बता दें कि बृजेश पाठक ने इस मुलाकात का वीडियो अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से भी साझा किया है।






