DELHI NEWS : भारत और चीन के रिश्ते एक बार फिर बातचीत के दौर में हैं। सात साल बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत पहुंचे हैं। BRICS समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक भी होगी। यह मुलाकात इसलिए अहम है, क्योंकि 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के रिश्ते लंबे समय तक तनाव में रहे। अब सीमा पर तनाव कम करने के प्रयासों और लगातार हो रही उच्चस्तरीय मुलाकातों के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या भारत और चीन पुराने विवाद पीछे छोड़कर नई शुरुआत करने जा रहे हैं? सीधा जवाब है रिश्ते सुधर रहे हैं, लेकिन भरोसा अभी वापस नहीं आया है। दोनों देशों के बीच बातचीत बढ़ सकती है, कारोबार को रफ्तार मिल सकती है और सीमा पर तनाव कम करने के उपाय आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन इसे भारत-चीन की दोस्ती या किसी नए रणनीतिक गठबंधन के रूप में देखना फिलहाल जल्दबाजी होगी।
गलवान के बाद पहली बार रिश्तों में दिखी लगातार गर्माहट
जून 2020 में गलवान की हिंसक झड़प के बाद भारत और चीन के रिश्ते सबसे मुश्किल दौर में पहुंच गए थे। सीमा पर दोनों तरफ सैनिक और सैन्य साजो-सामान की तैनाती बढ़ी। इसके बाद कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक बातचीत हुई। अक्टूबर 2024 में सीमा पर डिसइंगेजमेंट के बाद दोनों देशों के बीच तनाव कम होने के संकेत मिले। इसके बाद मोदी और जिनपिंग की मुलाकातें भी फिर शुरू हुईं। अब जिनपिंग का भारत आना उसी सिलसिले की बड़ी कड़ी है, इसका मतलब यह जरूर है कि दोनों देश टकराव से ज्यादा बातचीत को प्राथमिकता दे रहे हैं। लेकिन बातचीत का बढ़ना और रणनीतिक भरोसा लौटना दो अलग चीजें हैं।
चीन से कारोबार बढ़ाना भारत की जरूरत, लेकिन घाटा बड़ी चिंता
भारत और चीन के बीच रिश्ते सिर्फ सीमा तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं कई क्षेत्रों में एक-दूसरे से जुड़ी हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर, बैटरी, मशीनरी, टेलीकॉम और कई औद्योगिक क्षेत्रों में भारतीय कंपनियां चीनी कंपोनेंट्स और मशीनरी पर निर्भर हैं। 2025-26 में दोनों देशों के बीच करीब 151 अरब डॉलर का कारोबार हुआ। भारत ने चीन से करीब 132 अरब डॉलर का सामान खरीदा, जबकि करीब 19 अरब डॉलर का निर्यात किया। यानी भारत का व्यापार घाटा लगभग 112 अरब डॉलर रहा। यही सबसे बड़ा पेंच है। भारत चीन से कारोबारी रिश्ते सुधारना चाहता है, लेकिन ऐसा रिश्ता नहीं चाहता जिसमें आयात लगातार बढ़े और व्यापार घाटा भी बढ़ता जाए। इसलिए आने वाली बातचीत में कारोबार के साथ सप्लाई चेन और निवेश भी अहम मुद्दे रहेंगे।
मोदी-जिनपिंग-पुतिन की साथ वाली तस्वीर क्यों अहम?
BRICS में मोदी, जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का एक मंच पर होना अपने आप में बड़ा कूटनीतिक संदेश होगा। अमेरिका की टैरिफ और वैश्विक नीतियों का असर इन तीनों देशों पर पड़ा है। ऐसे में तीनों नेताओं का साथ दिखना यह बताता है कि वैश्विक राजनीति अब सिर्फ अमेरिका और उसके सहयोगियों तक सीमित नहीं है। लेकिन इसे भारत-रूस-चीन के किसी औपचारिक गठबंधन के तौर पर देखना सही नहीं होगा। भारत अमेरिका के साथ भी रणनीतिक संबंध रखता है और रूस के साथ भी। चीन के साथ भी बातचीत करता है। भारत का मकसद किसी एक खेमे में जाना नहीं, बल्कि अपने विकल्प खुले रखना है।
BRICS के लिए भी भारत-चीन की दूरी कम होना जरूरी
BRICS के विस्तार के बाद संगठन का दायरा काफी बढ़ गया है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और ग्लोबल साउथ के कई देशों की इसमें हिस्सेदारी है। ऐसे में इसके दो बड़े सदस्य भारत और चीन लगातार आमने-सामने रहें तो संगठन की सामूहिक ताकत प्रभावित हो सकती है, चीन के लिए इस बार की BRICS बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अगले साल इसकी मेजबानी बीजिंग करेगा। ऐसे में जिनपिंग का भारत आना चीन के लिए कूटनीतिक रूप से भी जरूरी है।
सबसे बड़ी अड़चन-सीमा और भरोसा
भारत-चीन रिश्ते की सबसे मजबूत दीवार आज भी सीमा विवाद और अविश्वास है। 1962 के युद्ध के बाद से दोनों देशों के बीच कई बार सीमा पर तनाव हुआ। देपसांग, चुमार, डोकलाम और गलवान जैसे विवाद दोनों देशों के रिश्तों पर गहरी छाप छोड़ चुके हैं। इसके अलावा चीन-पाकिस्तान की रणनीतिक साझेदारी भी भारत की चिंता का बड़ा कारण है। इसलिए सिर्फ मोदी-जिनपिंग की मुलाकात या दोनों नेताओं की गर्मजोशी भरी तस्वीर से यह नहीं माना जा सकता कि पुराना अविश्वास खत्म हो गया है, असल परीक्षा यह होगी कि दोनों देश सीमा पर सैन्य तनाव कम करने, हॉटलाइन और संवाद व्यवस्था मजबूत करने और विवादित क्षेत्रों में स्थिरता बनाए रखने के लिए कितनी दूर तक जाते हैं।
जिनपिंग के दौरे से क्या मिल सकता है?
इस यात्रा में तत्काल किसी बड़े सीमा समझौते की उम्मीद कम है। लेकिन कारोबार, निवेश, वीजा, सीधी उड़ानों और लोगों के बीच संपर्क जैसे मुद्दों पर आगे बढ़ने की संभावना ज्यादा है। सीमा विवाद पर बातचीत जारी रखने और सैन्य स्तर पर संवाद मजबूत करने पर भी सहमति बन सकती है। यानी जिनपिंग की यात्रा का सबसे बड़ा हासिल शायद कोई बड़ा ऐतिहासिक समझौता नहीं, बल्कि भारत-चीन रिश्ते को फिर से पटरी पर लाने की प्रक्रिया हो सकती है।
फिलहाल तस्वीर साफ है, भारत और चीन एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं, लेकिन एक ही पाले में नहीं। दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है, इसलिए बातचीत जारी रहेगी; लेकिन सीमा विवाद, पाकिस्तान और भारी व्यापार घाटे जैसे मुद्दे दोनों के बीच दूरी बनाए रखेंगे। आने वाले महीनों में यह तय होगा कि दिल्ली की यह मुलाकात सिर्फ कूटनीतिक गर्मजोशी तक रहती है या वास्तव में रिश्तों में कोई ठोस बदलाव लाती है।

